ब्लड प्रेशर काबू में रखे, हाजमा दुरुस्त करे, मुंह से बदबू दूर करे और आंखों की रोशनी बढ़ाए
सिद्धबली न्यूज डेस्क
कोटद्वार। पत्तियों संग तोड़े गए ताजे अमरूद को खाने की इच्छा भला किसी नहीं होती। जिनके दांत मजबूत वो कच्चा और जिनके दांत कमजोर वो पका अमरूद चाव से खाते हैं। जो दीवानगी आम को लेकर देखने को मिलती है वैसी ही अमरूद के साथ भी है। करीब 500 साल पहले पुर्तगाली अमरूद को भारत लेकर लाए। गोवा में सबसे पहले इसके पौधे लगे जिसे ‘पेरोन’ कहा गया। बंगाल में इसे ‘पेरु’ तो हिन्दी में इसे अमरूद कहा गया।
विदेशी धरती से भारत की धरती पर लाया गया यह पौधा यहीं रच-बस गया और भारत आज दुनिया में सबसे ज्यादा अमरूद पैदा करता है। अब तो देश के अलग-अलग जगहों की मिट्टी में 30 से अधिक वैराइटी के अमरूद मिलते हैं। इनमें सबसे मशहूर है इलाहाबादी अमरूद जिसे सेबिया अमरूद भी कहते हैं। सेबिया अमरुद यानी सेब की तरह दिखने वाला अमरुद। कहा जाता है कि मुगल बादशाह अकबर के बेटे सलीम ने एक बाग लगवाया जिसमें अमरुद के भी पौधे थे। सलीम के बेटे खुसरो के नाम पर इस बाग को खुसरो बाग कहा गया। इसी खुसरो बाग के इलाहाबादी अमरूद पूरी दुनिया में मशहूर हैं। ऊपर से हरा, लाल, अंदर से गुलाबी, गूदा ऐसा कि मुंह में जाते ही घुल जाए। इसकी मिठास और खुशबू से आप पहचान जाएंगे कि यहीं कही इलाहाबादी अमरूद है। इसलिए इलाहाबादी अमरुद की सफेद और सुर्खा किस्म की डिमांड होती है।
नोट फायदेमंद अमरूद विषय पर भाग दो कल प्रकाशित होगा
साभाार
नरेश थपलियाल