सिद्धबली न्यूज़ डेस्क
कोटद्धार । स्त्री शरीर के हर अंग को सजाने वाले गहनों में से एक है नथ जो ख़ूबसूरती निखारने के साथ ही सुहाग का प्रतीक भी है। नथ का इतिहास 4 हजार साल से भी ज्यादा पुराना ईरान, इराक जैसे मध्यपूर्व देशों तक फैला हुआ है, जहां इसे ‘शंफ’ कहा जाता था। बाइबिल में इसका जिक्र एक अनमोल तोहफ़ा के रूप में खास-तौर से किया गया है जो इब्राहिम के नौकर द्वारा इसहाक की भावी पत्नी रेबका को दिया गया एक तोहफा था, जो धन-वैभव का प्रतीक है।
इजराइल से ईरान होते हुए भारत आई नथ
भारत में कर्ण छेदन का चलन सदियों पुराना है। लेकिन नाक छेदने का कोई जिक्र नहीं मिलता। इजराइल में क्राइस्ट के जन्म से बहुत पहले से नाक छिदवाने का चलना था। नथ का इजराइल में बहुत महत्व हुआ करता था। इजराइल-फिलिस्तीन या मध्यपूर्व से नाक के आभूषण ईरान होते हुए भारत में मुगल महलों तक पहुंचे।
भारत में मुगल लेकर आए नथ
भारत में नथ पहनने की परंपरा मुगल काल से शुरू हुई जो 16वीं शताब्दी में मध्य एशिया से आए थे। फारसी और अरबी संस्कृतियों की तरह मुगल काल में भी पुरुष और महिलाओं में नाक में बाली पहनने का शौक आम था। मुगल अपने साथ अपनी कला, वास्तुकला, व्यंजन और फैशन लेकर आए जिसमें से नथ भारतीय महिलाओं के साज श्रृंगार का जल्द ही हिस्सा बनी।
भाग – दो कल
नथ पर एक खोज।
नथ केवल विवाहित स्त्रियां ही पहनती है।
‘बड़ा दुख दीना नथनिया ने’ गाना अपने समय का सबसे मोहित करने वाला गाना था। आज भी गाया जाय तो बड़ा भायेगा है।